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Friday, January 7, 2022

जनसंदेश टाइम्स - मैं ही नहीं हम सब रोहित वेमुला

जनसंदेश टाइम्स 

मैं ही नहीं हम सब रोहित वेमुला

कवि , कहानीकार संजय कुंदन इनदिनों लगातार नुक्कड़ नाटक, एकल लिख रहे हैं। पिछले दिनों 'हसमुख नवाब' पढ़ने को मिला था, अभी - अभी उनका एकल ' मैं भी रोहित वेमुला'। इस हफ्ते यह एकल अचानक रंगमंच की दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है। मेरे पास कई लोगों के फोन आया कि क्या आपके पास संजय कुंदन का नंबर है? मैं समझ जाता था कि इस एकल के लिए बात करना चाहते हैं। मैंने उन्हें नंबर तो दिया ही, स्क्रिप्ट भी लगे हाथ व्हाट्सएप्प कर दिया। ये सब कमाल इस लिए हुआ है कि 4 जनवरी को थिएटर ऑफ रेलेवेन्स के निर्देशक मंजुल भारद्वाज ने मुम्बई, पनवेल में इस एकल का पहला मंचन किया और उसकी एक वीडियो अपलोड की।

इस एकल को लिखना और करना आसान नहीं है। रोहित वेमिला पर नाटक करने का मतलब है कि आप सत्ता और इस वर्णवादी व्यवस्था पर कुछ तंज करने जा रहे हैं। लिखने वाला जानता है कि हर कोई इस नाटक को नहीं करेगा। कोई भी जाति जैसे सवाल से टकराना नहीं चाहता है। निर्देशक के लिए तो और मुसीबत है कि इस पर उन्हें कोई सरकारी ग्रांट नहीं मिलनेवाला है, बल्कि दलित धारा या अम्बेडकरवादी का मुलम्मा जड़ने का खतरा बन जाता है। इसलिए मुख्यधारा का रंगमंच हो या प्रगतिशील धारा का, साम्प्रदायिकता के मुद्दे को तो उठा लेता है, वर्ण पर चोट करने से परहेज करता है। लेकिन मंजुल भारद्वाज निर्भीक होकर विपरीत धारा में चलने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। जहां साहित्य अकादमी 'सम्राट अशोक' जैसे नाटक को पुरस्कृत कर बुद्ध के दर्शन को खारिज कर ब्राह्मणवाद की पैरवी करता दिखता है, मंजुल भारद्वाज धनन्जय कुमार के नाटक 'सम्राट अशोक' के माध्यम से अशोक के उस सकारात्मक पक्ष को सामने लाता है जो समानता, करुणा, दया पर आधारित है।




संजय कुंदन का यह एकल रोहित वेमुला की कोई जीवनी नहीं है, बल्कि इस बहाने रोहित सिंह के संघर्ष को सामने लाता है। निम्न जाति का होने के कारण स्कूल से लेकर विश्व विद्यालय तक उसके साथ जो भेद भाव होता रहा है, यहां तक कि प्रेम के सवाल पर भी उसे जिस सच्चाई का सामना करना पड़ रहा है, संवादों के माध्यम से व्यक्त हुआ है। मंजुल भारद्वाज इसे खुले स्थान में लगातार कर रहे हैं और हर मंचन के बाद जिस अनुभव से गुजर रहे हैं , वो उल्लेखनीय है। एक मंचन के बाद एक दर्शक की प्रतिक्रिया थी कि इस नाटक ने तो मुझे आत्महत्या करने से बचा लिया है। जाति दमन से वो दर्शक इतना क्षुब्ध था कि अपनी जिंदगी खत्म करना चाहता था, अब इस एकल के नायक की तरह लड़ने को तैयार है। इस एकल में रोहित सिंह जब जेल से बाहर आता है तो एक लंबी लड़ाई लगने का निर्णय लेता हुआ दिखता है।यह बिंदु इस नाटक की सफलता है जो मंजुल भारद्वाज के सशक्त अभिनय और दमदार आवाज से पूरी तरह अभिव्यक्त हो रहा है।

इस शानदार नाटक के लिए संजय कुंदन को लेखन के लिए और मंजुल भारद्वाज को इसे मंच पर लाने का जो साहस किया है, सलाम करने की जरूरत है।