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Sunday, October 29, 2017

ऑफ द ट्रैक - प्रतिबद्ध रंगकर्मी - मंजुल भारद्वाज

ऑफ द ट्रैक - प्रतिबद्ध रंगकर्मी - मंजुल भारद्वाज

NBT
रविवार, 29 अक्टूबर 2017 
संडे नवभारत टाइम्स 

ऑफ द ट्रैक - प्रतिबद्ध रंगकर्मी - मंजुल भारद्वाज  NBT रविवार, 29 अक्टूबर 2017  संडे नवभारत टाइम्स       आज  के दौर में कोई अनवरत वर्ष तक रंगकर्म से जुड़ा रहे। उसी अट्ठाइस को ओढ़ना और बिछौना बना ले। उसकी आजीविका भी वही हो। यह सब वह बिना किसी सरकारी अनुदान या कॉरपोरेट स्पॉन्सरशिप के करे, तो अपने आपमें आश्चर्यचकित करनेवाली घटना ही मानी जाएगी। नाट्य संस्था 'थिएटर ऑफ रेलेवंस' के संस्थापक मंजुल भारद्वाज ने यह साहसिक कार्य किया है और उन्हें भरपूर सफलता भी मिली है। बीते अगस्त माह में उनकी संस्था अपनी स्थापना के पच्चीस वर्ष पूरे कर चुकी है। इसी उपलक्ष्य में अब वे देश के कई शहरों में रंग पर्व मना रहे हैं। हाल ही में उन्होंने दिल्ली में बेहद सफल कार्यक्रम का आयोजन किया। अब आगामी 15-16-17 नवंबर को वे मुंबई में भी एक भव्य समारोह करने जा रहे हैं।  निश्चित रूप से मंजुल ने एक ऐसा सफर तय किया है, जिसके बारे में बड़े-बड़े महारथी सोचते रह जाते हैं। हरियाणा के एक छोटे से गांव के युवक मंजुल को चेखव, ब्रेख्त और शेक्सपीयर के नाटकों ने बहुत आकर्षित किया। विज्ञान की पढ़ाई कर रहे इस युवक ने एक दिन अपने आपसे प्रतिज्ञा कर ली कि जीवन में अब वह सिर्फ रंगकर्म करेगा। यह निर्णय आसान नहीं था, लेकिन अपने ऊपर अटूट भरोसे के चलते वे कदम-दर-कदम आगे बढ़ते चले गए और देखते ही देखते उन्हें दर्शकों का अटूट भरोसा भी हासिल हो गया। असल में 'थिएटर ऑफ रेलेवंस' का सूत्र वाक्य ही है- दर्शक पहला रंगकर्मी है। उनका स्पष्ट मत है कि रंगकर्म मनोरंजन से अवश्य शुरू हो सकता है, लेकिन उस पर खत्म नहीं हो सकता।  रंगकर्म के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता के चलते ही उन्हें दसियों बड़ी उपलब्धियां हासिल हुई हैं। वे अब तक अपने अट्ठाइस नाटकों के सोलह हजार शो कर चुके हैं। 1992 में उन्होंने पहला नाटक 'दूर से किसी ने आवाज दी' लिखा था। उसे निर्देशित और मंचित किया था। तब मुंबई दंगों की आग में झुलस रही थी। उनके इस नाटक ने सांप्रदायिक सौहाद्र स्थापित करने में भूमिका निभाई थी और उनके अभिनय की तारीफ हुई थी। उल्लेखनीय है कि 'थिएटर ऑफ रेलेवंस' के लगभग हर नाटक में मंजुल ने अभिनय किया है । इतना ही नहीं, मंचित हुए दर्जनभर नाटक तो खुद उनके ही लिखे हुए है। कम महत्व की बात नहीं है कि पिछले पच्चीस वर्षों में चार लाख लोगों ने उनके नाटक देखे हैं। मुंबई से लेकर मणिपुर और कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक वे पूरे हिंदुस्तान में अपने नाटकों का मंचन कर चुके हैं। दुनिया के कितने ही देशों में उनके रंगकर्म के प्रशंसक हैं। खास कर यूरोप में उन्होंने अपने नाटकों का बड़े स्तर पर मंचन किया है। पूर्वी जर्मनी और पश्चिमी जर्मनी के कितने ही गांवों, कस्बों और शहरों में वे अपने नाट्य दल के साथ गए हैं। बता दें कि अब तक वे दुनिया के अट्ठाइस देशों में अपने नाटकों का सफलतापूर्वक प्रदर्शन कर चुके हैं। इधर मंजुल के मन में 'थिएटर ऑफ रिलेवंस विश्वविद्यालय' जैसा बड़ा सपना पल रहा है। उनके समर्पण को देखकर कह सकते हैं कि जरूर उन्हें यह मंजिल भी मिलेगी।  - निर्मला पांडेय


आज  के दौर में कोई अनवरत वर्ष तक रंगकर्म से जुड़ा रहे। उसी अट्ठाइस को ओढ़ना और बिछौना बना ले। उसकी आजीविका भी वही हो। यह सब वह बिना किसी सरकारी अनुदान या कॉरपोरेट स्पॉन्सरशिप के करे, तो अपने आपमें आश्चर्यचकित करनेवाली घटना ही मानी जाएगी। नाट्य संस्था 'थिएटर ऑफ रेलेवंस' के संस्थापक मंजुल भारद्वाज ने यह साहसिक कार्य किया है और उन्हें भरपूर सफलता भी मिली है। बीते अगस्त माह में उनकी संस्था अपनी स्थापना के पच्चीस वर्ष पूरे कर चुकी है। इसी उपलक्ष्य में अब वे देश के कई शहरों में रंग पर्व मना रहे हैं। हाल ही में उन्होंने दिल्ली में बेहद सफल कार्यक्रम का आयोजन किया। अब आगामी 15-16-17 नवंबर को वे मुंबई में भी एक भव्य समारोह करने जा रहे हैं।

निश्चित रूप से मंजुल ने एक ऐसा सफर तय किया है, जिसके बारे में बड़े-बड़े महारथी सोचते रह जाते हैं। हरियाणा के एक छोटे से गांव के युवक मंजुल को चेखव, ब्रेख्त और शेक्सपीयर के नाटकों ने बहुत आकर्षित किया। विज्ञान की पढ़ाई कर रहे इस युवक ने एक दिन अपने आपसे प्रतिज्ञा कर ली कि जीवन में अब वह सिर्फ रंगकर्म करेगा। यह निर्णय आसान नहीं था, लेकिन अपने ऊपर अटूट भरोसे के चलते वे कदम-दर-कदम आगे बढ़ते चले गए और देखते ही देखते उन्हें दर्शकों का अटूट भरोसा भी हासिल हो गया। असल में 'थिएटर ऑफ रेलेवंस' का सूत्र वाक्य ही है- दर्शक पहला रंगकर्मी है। उनका स्पष्ट मत है कि रंगकर्म मनोरंजन से अवश्य शुरू हो सकता है, लेकिन उस पर खत्म नहीं हो सकता।

रंगकर्म के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता के चलते ही उन्हें दसियों बड़ी उपलब्धियां हासिल हुई हैं। वे अब तक अपने अट्ठाइस नाटकों के सोलह हजार शो कर चुके हैं। 1992 में उन्होंने पहला नाटक 'दूर से किसी ने आवाज दी' लिखा था। उसे निर्देशित और मंचित किया था। तब मुंबई दंगों की आग में झुलस रही थी। उनके इस नाटक ने सांप्रदायिक सौहाद्र स्थापित करने में भूमिका निभाई थी और उनके अभिनय की तारीफ हुई थी। उल्लेखनीय है कि 'थिएटर ऑफ रेलेवंस' के लगभग हर नाटक में मंजुल ने अभिनय किया है । इतना ही नहीं, मंचित हुए दर्जनभर नाटक तो खुद उनके ही लिखे हुए है। कम महत्व की बात नहीं है कि पिछले पच्चीस वर्षों में चार लाख लोगों ने उनके नाटक देखे हैं। मुंबई से लेकर मणिपुर और कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक वे पूरे हिंदुस्तान में अपने नाटकों का मंचन कर चुके हैं। दुनिया के कितने ही देशों में उनके रंगकर्म के प्रशंसक हैं। खास कर यूरोप में उन्होंने अपने नाटकों का बड़े स्तर पर मंचन किया है। पूर्वी जर्मनी और पश्चिमी जर्मनी के कितने ही गांवों, कस्बों और शहरों में वे अपने नाट्य दल के साथ गए हैं। बता दें कि अब तक वे दुनिया के अट्ठाइस देशों में अपने नाटकों का सफलतापूर्वक प्रदर्शन कर चुके हैं। इधर मंजुल के मन में 'थिएटर ऑफ रिलेवंस विश्वविद्यालय' जैसा बड़ा सपना पल रहा है। उनके समर्पण को देखकर कह सकते हैं कि जरूर उन्हें यह मंजिल भी मिलेगी।

- निर्मला पांडेय